बात 1980 की रही होगी, जब मैं प्राथमिक शिक्षा की ओर कदम बढ़ा रहा था परंतु दुश्वारी यह थी कि मेरे गाँव सपहा में स्कूल ही नहीं था। मजबूरन पड़ोसी गांव बागर में नाम लिखवाया गया। कक्षा 5 पास करने के बाद जूनियर स्तर की शिक्षा के लिए स्कूल खोजना पड़ा, यह तलाश कुर्रैया (पूर्व मंत्री डॉक्टर विनोद तिवारी जी का गांव) जाकर पूर्ण हुई। प्रतिदिन सपहा से 5-6 किमी दूर कुर्रैया पैदल ही जाना पड़ता था। 1988 आते आते कक्षा 8 की बोर्ड परीक्षा (जी हां ! चौकिए मत, उस समय कक्षा 8 की परीक्षा बोर्ड की भांति बेला शाहजहांपुर के जूनियर स्कूल में वहां रहकर देनी पड़ी थी) भी पास कर ली। डॉक्टर विनोद तिवारी उस समय दूसरी बार कांग्रेस से पूरनपुर के विधायक थे और उनकी पार्टी ही सत्तारूढ़ थी परंतु दुर्भाग्य यह कि उनके गांव में भी कोई हाईस्कूल या इंटर कॉलेज नहीं था। मजबूरन पूरनपुर का रुख करना पड़ा। गांव से यह दूरी 25 किमी थी जिसे हर सुबह साइकिल से तय करके पीआईसी जाना और वापस आना रोज की आदत बन गई थी। सर्दी की सुबह कोहरे में यह सफर बड़ा मुश्किल होता था। खुद की पढ़ाई में इतनी सब मशक्कत झेलने के बाद सोचा कि क्यों ना इलाके के छात्र छात्राओं की यह समस्या समाप्त की जाए और जो कष्ट मैंने झेले हैं वो हमारे इलाके के बच्चों को न भुगतने पड़ें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने गांव में पिता जी आदरणीय श्री जियालाल मिश्र जी की स्मृति में उनके नाम से इंटर कॉलेज खोलने का संकल्प लिया परंतु कक्षा 10 तक की मान्यता विद्यालय भवन की संरचना के अनुसार शुरुआत में मिल पाई। काफ़ी कम शुल्क लेकर योग्य अध्यापकों द्वारा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाते हुए पिछले 6 साल से विद्यालय का सफल संचालन किया जा रहा है। यह स्कूल खुलने से इलाके के लोगों को उनके पाल्यों के लिए शिक्षा काफ़ी सुगम हुई है। खासकर उन छात्राओं के लिए जो पूरनपुर या पीलीभीत जाकर शिक्षा ग्रहण नहीं कर पातीं थीं। विद्यालय 2020 से निरंतर यूपी बोर्ड की परीक्षा का सेंटर भी बनवाया ताकि पड़ोस में ही परीक्षा देने का विकल्प उपलब्ध हो सके। शिक्षकों व छात्र छात्राओं की मेहनत से रिजल्ट भी काफी अच्छा आ रहा है। लोग लाभ कमाने के लिए स्कूल खोलते होंगे परंतु मैंने अब तक घाटे का सौदा किया है। शुरुआत कुछ ठीक रही परन्तु कोविड ने स्कूलों की आर्थिक स्थिति बदतर कर डाली। विद्यालय संचालन में नुकसान तो हो रहा है परंतु मैं समझता हूँ कि इस विद्यालय की स्थापना के बाद से मेरे इलाके के छात्र छात्राओं को पढ़ाई के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता है। साथ में विद्यालय के साथ मेरे पिता जी का नाम अमर हो गया है, उनकी शिक्षाएं जीवित नजर आतीं हैं। यह ही मेरी सबसे बड़ी पूंजी व लाभ है। दर्जन भर लोगों को रोजगार मिला है इसे ब्याज मानता हूँ। अभिभावकों से कहना चाहता हूँ कि स्कूल को अपना मानकर इससे जुड़े रहें, अपने बच्चों को पढ़ाते रहें। क्योंकि बच्चे पढ़ेंगे तभी तो आगे बढ़ेंगे। विश्वास दिलाता हूँ कि आप सबका सहयोग रहा तो आने वाले सालों में इंटरमीडिएट तक की मान्यता कराकर इस स्कूल को इंटर कॉलेज तक पहुंचाने का प्रयास करूंगा।
सादर वंदन, अभिनंदन।
सतीश मिश्र “पत्रकार”
प्रबंधक, पण्डित जियालाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सपहा (पीलीभीत)